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Wednesday, November 24, 2010

जीवन का सही अर्थ

   एक छोटी सी नन्ही सी पत्ती
        हिलती है और कुछ कह जाती है 
     मन में नई उमंगें 
             और कई  सपने दिखला जाती है
   हर पल जीती, हर पल इठलाती 
          कितने दर्द सह जाती है
   अपने छोटे से जीवन में ,
          जीवन की सही परिभासा बतला जाती है
   एक छोटी सी नन्ही सी पत्ती
          हिलती है और कुछ कह जाती है...


    वंदन करती उन पुष्पों का 
             जिनमे गुंजन भवरो का होता
    आभूषण बनती उन डालो का 
              जिनमे बसेरा चिड़ियो का होता
    अलंकृत करती उस पौधे का
              जिसमे श्रंगार हरियाली का  होता
     विकास करती उस वृक्ष का  
               जिससे पोसण  जन मानुष का होता
    एक छोटी सी नन्ही सी पत्ती
           हिलती है और कुछ कह जाती है ...

    जीती सिर्फ कुछ पल के लिए 
            लेकिन कितना कुछ बतला जाती है 
    परोपकार परमो धरमा 
             जीवन का अर्थ बता जाती है 
    अंत मैं मिलती उस माटी में 
              जहा सबके पैरो की धूल आती है
     फिर भी गर्व का अनुभव करती है 
              जब उस माटी में अपना पन पाती है
     अपने जीवन को सर्वोतम बताती है 
             और  जीवन का अर्थ समझा जाती है
     एक छोटी सी नन्ही सी पत्ती
            हिलती है और कुछ कह जाती है
    मन में नई उमंगें
             और कई  सपने दिखला जाती है......
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Sunday, December 13, 2009

PAL PAL KINARA पल पल किनारा

   
                पल पल किनारा


चलते चलते दिन गुजर गए
                   चलते चलते रात गुजर गयी
जो दिल में थी बात
                   वो दिल मे रह गयी
लाल्साओ का सागर उठा
                   पर उम्मीद का कहा सहारा था
 जहा पैर धरा ,
                   वहा से  सौ  मील किनारा था  
 सौ  मील किनारा था_ _ _


आशाओ का दीपक जल उठा 
                        जब एक पत्ति का सहारा था 
एक उम्मीद उठी दिल में
                       सायद बगल में किनारा था 
 पैर बढाया , तो फिसल गया 
                        दूर हो गया जो पत्ति का जो सहारा था ,
 डूब गया उस सागर में ,
                         जहा कोई कहा हमारा था,
 ऐसा वो नजरो का नजराना था ,
                          पर नजर उठा कर मैंने देखा ,
 मैं वही था  ,  
          जहा से सौ  मील किनारा था                   
                            सौ  मील किनारा था_ _ _

Sunday, February 17, 2008


                                           उड़ान 
  इस कविता के माध्यम से मे उस कमजोर वर्ग का उत्साह वर्धन करना चाहता हू ,जो मानसिक अथवा शारारिक रूप से विकृत है ,जिन्हें उनके कमजोर होने का हर बार एहसास कराया जाता है ,और इस से निराश हो कर वोह जिंदगी से हार मान लेते है |  इस कविता में एक पक्षी का उदाहरण  दिया गया है जो अपने पंख कट जाने पर भी आसमा छूने का विश्वास रखता है |  
अहंकारी समाज जिसे एक मनुष्य से प्रदर्शित क्या गया है ,वो कमजोर पक्षी का उपहास उड़ाते हुए कहता हैं 

 कट जायेंगे  पंख तुम्हारे
           जिन पर तुझको नाज है
                    मत भूल ! तू है एक मात्र परिंदा |
         बिन पंखो के क्या काज है   
        
    लेते उड़ान उस नभ की  
               जहा साथी संघ का साथ है
         कट जायेंगे पंख तुम्हारे
               फिर तेरी क्या आस है
                        फिर तेरी क्या आस है ---है
पक्षी बड़े ही आत्मविश्वास के साथ मनुष्य को   उत्तर देता हुए कहता :
कट जायेंगे पंख हमारे
             फिर भी कुछ करने की प्यास
 नभ छूने   की आस है
                 उड़ने  का  विश्वाश  है
          
उड़ान पंखो से नही तेरी
               तेरी इछाशक्ति का अभ्यास   है
 मत भूलो ! ऐ मानव तू भी
        सम्भव सब कुछ है
  जब तक तुझ में आस है
                      छुलेगे आसमा को भी
 यदि द्रयन्य  निश्चय
                   और आत्मविस्वास  है
 इरादों ने बदली दुनिया
                    कह रहा इतिहास है
 कट जायेंगे पंख हमारे
                      फ़िर भी कुछ करने की आस है
        नभ छूने की प्याश है
                     कुछ नया करने का विश्वाश है